Wednesday, April 21, 2010

का.हि.वि.वि. की जिंदगी


आजकल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में परीक्षाओं का दौर चल रहा है। बेचारे बच्चे प्रश्नपत्र पाने के लिए जुगार लगा रहे है। वे और कर भी क्या सकते है? साल भर मस्ती करने के बाद परीक्षा में पास होने की उम्मीद भी कैसे की जाये। अब एक-दो किताबें पढ़नी हो तो लड़का पढ़ भी ले, परन्तु यहाँ तो किताबों का ढेर लगा हुआ है पढने को। इसलिए लड़के पहले ही हिम्मत हार जाते हैं, और उसके बाद एकमात्र रास्ता यही बचता है की या तो कही से गेस जुगार करो या फिर खुद को अगले साल बैक देने के लिए तैयार करो।
वैसे प्रोफेसरों की भी इन बच्चों से पूरी हमदर्दी है। इसलिए जहाँ तक हो सकता है वे इन बच्चों की मदद करते है। अगर कला और सामाजिक विज्ञान संकायों के प्रोफेसरों की बात की जाये तो वहां भी बुरा हाल ही है। अगर कुछेक को छोर दें तो बाकि सारे प्रोफ़ेसर केवल गप्पें हांकने में आगे है। कमोबेश सारे संकायों का यही हाल है।

वैसे तो इस विश्वविद्यालय के बच्चे किसी से भी नहीं डरते, परन्तु अगर बात प्रोक्टोरिअल बोर्ड की हो तो थोड़ा सोचना पड़ेगा। भाई! विश्वविद्यालय में प्रोक्टोरिअल बोर्ड की तानाशाही है,ऐसे में लड़के बेचारे डरे नहीं तो और क्या करे? परन्तु बोर्ड की भी अपनी मज़बूरी है ,अब इतने बड़े विश्वविद्यालय को चलने के लिए थोड़ी बहुत सख्ती तो करनी ही पड़ती है
बस इसी तरह का.हि.वि.वि. की जिंदगी अपनी लय में चल रही है।वैसे भी बनारसियों का का ये तकिया-कलाम तो प्रसिद्ध है ही----
"जाये द गुरु, जे होई देखल जाई"

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